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Mauganj Police News : थाना प्रभारी जगदीश सिंह ठाकुर की आराजक कार्यशैली की लंबी फेहरिस्त! विधायक प्रदीप पटेल के कई बार आवाज उठाने के बाद भी मूकदर्शक बने रहे अधिकारी

Mauganj Police News

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Mauganj Police News : मऊगंज जिले में हालिया घटनाक्रम केवल एक थाना प्रभारी की कार्यशैली का सवाल नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक संवेदनशीलता, जवाबदेही और समय रहते लिए जाने वाले निर्णयों की गंभीर परीक्षा भी है। यह वह कहानी है, जिसमें चेतावनी देने वाली आवाज़ वर्षों तक गूंजती रही, लेकिन उसे या तो राजनीतिक चश्मे से देखा गया या व्यक्तिगत विरोध बताकर दरकिनार कर दिया गया।

Mauganj Police News : थाना प्रभारी जगदीश सिंह ठाकुर की आराजक कार्यशैली को लेकर मऊगंज विधायक प्रदीप पटेल तब से आवाज़ उठाते रहे, जब उनकी पदस्थापना शाहपुर थाना में थी। शाहपुर में रहते हुए अपराधियों और अवैध कारोबारियों से सांठ-गांठ कर निर्दोष लोगों पर दर्जनों अपराध दर्ज किए गए। जब खाकी का भय आमजन के लिए आतंक में बदलने लगा, तब पीड़ित जनता ने विधायक प्रदीप पटेल की शरण ली। जनदबाव और विधायक के निरंतर हस्तक्षेप के बाद ही पुलिस प्रशासन को मजबूरन कार्रवाई करनी पड़ी और जगदीश सिंह ठाकुर को शाहपुर थाना से हटाया गया।

लेकिन यह कार्रवाई सुधार का संकेत नहीं बन सकी। लौर थाना में पदस्थ रहते हुए भी वही प्रवृत्ति जारी रही—अपराधियों को संरक्षण और निर्दोषों को फंसाने का सिलसिला। स्थिति तब और गंभीर हो गई, जब सीतापुर के एक कुख्यात अपराधी पर लव जिहाद जैसे संवेदनशील मामले में संरक्षण देने के आरोप सामने आए। पीड़ित पक्ष का कहना है कि रिपोर्ट दर्ज कराने पहुंचे लोगों को ही रातभर थाना में बैठाया गया और रिपोर्ट के एवज में पैसों की मांग की गई। कथित लेन-देन के बाद भी जब सुनवाई नहीं हुई, तब एक बार फिर पीड़ितों ने विधायक का दरवाज़ा खटखटाया।

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विधायक प्रदीप पटेल प्रयागराज से चलकर सीतापुर पहुंचे, पीड़ितों के साथ एसपी कार्यालय मऊगंज गए और तत्कालीन पुलिस अधीक्षक रसना ठाकुर के समक्ष प्रमाण व दस्तावेज रखे। उन्हीं साक्ष्यों के आधार पर जगदीश सिंह ठाकुर को निलंबित किया गया। यह कार्रवाई इस बात का प्रमाण थी कि आरोप हवा में नहीं थे।

प्रदीप पटेल, विधायक मऊगंज

दुर्भाग्य यह रहा कि राजनीतिक रसूख के चलते कुछ ही दिनों में निलंबन समाप्त कर उन्हें नईगढ़ी थाना की कमान सौंप दी गई। नईगढ़ी पहुंचते ही फर्जी एफआईआर की लंबी फेहरिस्त सामने आने लगी। लव जिहाद प्रकरण को उजागर करने वाले पत्रकार पर शराब कारोबारियों के गुर्गों के माध्यम से मनगढ़ंत कहानी गढ़कर फर्जी मामला दर्ज किया गया। यहीं तक नहीं, बल्कि अपने निलंबन से आहत कथित थाना प्रभारी ने विधायक प्रदीप पटेल के खिलाफ अपशब्दों का प्रयोग करते हुए गिरफ्तारी की धमकी तक दे डाली।

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जब विधायक स्वयं नईगढ़ी थाना पहुंचे, तो उनके आगमन की सूचना मिलते ही कथित थाना प्रभारी थाना छोड़कर भाग खड़ा हुआ। अंततः लिखित रूप से स्वीकार करना पड़ा कि विधायक प्रदीप पटेल के खिलाफ कोई मामला नहीं है।
यह सब घटनाक्रम इस बात को रेखांकित करता है कि विधायक प्रदीप पटेल वर्षों से जिस आराजक कार्यशैली का विरोध करते रहे, उसे प्रशासन ने गंभीरता से नहीं लिया।

परिणामस्वरूप आज स्थिति यह है कि मऊगंज और यहां का प्रशासन पूरे प्रदेश ही नहीं, बल्कि देशभर में सुर्खियों में है। फर्जी एफआईआर और पुलिसिया दमन की खबरें अखबारों से लेकर टीवी चैनलों तक ब्रेकिंग न्यूज़ बनीं।
आखिरकार, दबाव बढ़ने पर थाना प्रभारी को हटाकर रक्षित केंद्र में संबद्ध करने का आदेश जारी किया गया। लेकिन सवाल यह है—क्या यह कार्रवाई समय पर हुई? यदि विधायक की बातों को पहले गंभीरता से लिया जाता, तो शायद न मऊगंज की छवि धूमिल होती और न ही प्रशासन की निष्क्रियता पर उंगलियां उठतीं।

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आज हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि जगदीश सिंह ठाकुर को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से संरक्षण देने वाले अधिकारियों को भी माननीय उच्च न्यायालय के समक्ष जवाब देना पड़ेगा। यह केवल एक व्यक्ति की जिम्मेदारी तय करने का मामला नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था के आत्ममंथन का अवसर है।
विधायक प्रदीप पटेल की यह लड़ाई व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक और जनकल्याणकारी पहल थी। दुर्भाग्यवश, इसे राजनीतिक रंग देकर कमजोर करने की कोशिश की गई। अब जब सच्चाई सामने है, तो यह स्वीकार करना होगा कि चेतावनी को अनसुना करने की कीमत जिले ने चुकाई है।

 

सबक स्पष्ट है—जब जनप्रतिनिधि समय रहते आवाज़ उठाएं, तो प्रशासन का कर्तव्य है कि वह उसे पूर्वाग्रह से मुक्त होकर सुने और निष्पक्ष कार्रवाई करे। वरना देर से की गई कार्रवाई केवल नुकसान की भरपाई बनकर रह जाती है, समाधान नहीं।

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