MP NEWS: खाकी : रक्षक या भक्षक?
जब भी कोई व्यक्ति खुद को असुरक्षित महसूस करता है, उसके ज़हन में सबसे पहले जो तस्वीर उभरती है, वह खाकी वर्दी की होती है। यही पुलिस आम लोगों की सुरक्षा की पहली उम्मीद होती है। लेकिन ज़रा सोचिए, अगर यही रक्षक, भक्षक बन जाए, तो आम जनता अपनी पीड़ा किसे सुनाए? फिर कानून का शासन नहीं, बल्कि रसूखदारों और रंगदारों का राज कायम हो जाएगा। ऐसे में समाज के गरीब, वंचित और कमजोर वर्ग के लोगों के लिए चारदीवारी के भीतर रहना ही सुरक्षित विकल्प बन जाएगा।
ख़ाकी के भरोसे पर उठ रहा सवाल
MP NEWS: मध्यप्रदेश में इन दिनों पुलिस की कार्यशैली पर उठ रहे सवाल अब केवल चर्चा तक सीमित नहीं हैं, बल्कि जनता के आक्रोश की आवाज़ बन चुके हैं। रक्षक कही जाने वाली वर्दी आज कई मामलों में भक्षक की पहचान बनती जा रही है।
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ये है पूरा मामला
ख़ाकी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने वाला ये गंभीर मामला सतना जिले से सामने आया है। जमीनी विवाद से परेशान किसान ब्रजमोहन मिश्रा न्याय की आस में डायल 112 पर कॉल करता है। उसे उम्मीद होती है कि पुलिस आएगी और विवाद का समाधान करेगी।
लेकिन मदद की जगह जो पहुंचा, वह जुल्म बनकर आया। आरोप है कि डायल 112 टीम में तैनात आरक्षक लाल सिंह ने किसान के साथ पहले गाली-गलौज की और फिर प्लास्टिक पाइप से बेरहमी से पिटाई की।
इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है।वायरल वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि किसान शांत है—न कोई हमला, न कोई बदतमीजी—इसके बावजूद पुलिसकर्मी वर्दी का रौब दिखाते हुए युवक पर लगातार प्रहार करता है।
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MP NEWS: यह वही पुलिस है, जिसे जनता की सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
यह वही डायल 112 है, जिस पर लोग संकट के समय भरोसा करते हैं और जिसके आसपास होने पर खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं। लेकिन पुलिस महकमे की इस कार्यशैली ने यह स्पष्ट कर दिया है कि प्रदेश की कानून व्यवस्था अब भरोसे के नहीं, बल्कि भय के सहारे चल रही है।
बीते कुछ दिनों में सामने आए वीडियो, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और पीड़ितों की आपबीती ने पुलिस का असली चेहरा उजागर कर दिया है।
कहीं न्याय मांगने वाला किसान पीटा जाता है,
कहीं शिकायत लेकर पहुंचा युवक ही अपराधी बना दिया जाता है,
तो कहीं महिलाएं थानों के चक्कर काटने को मजबूर हैं।
सवाल यह है, क्या यही है मध्यप्रदेश की संवेदनशील पुलिसिंग?
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सबसे गंभीर पहलू यह है कि पुलिस अब कानून के दायरे में नहीं, बल्कि प्रभावशाली लोगों के इशारों पर चलती नजर आ रही है। गरीब, दलित, आदिवासी और कमजोर वर्ग के लिए थाना आज भी डर का प्रतीक बना हुआ है।
ग्रामीण इलाकों में हालात और भी भयावह हैं। जमीन विवाद, पारिवारिक झगड़े, अवैध कब्जे या सामाजिक विवाद—हर जगह पुलिस की भूमिका निष्पक्ष मध्यस्थ की बजाय सौदेबाज़ जैसी दिखाई देती है। कई मामलों में थाने अब न्याय के मंदिर नहीं, बल्कि समझौतों की मंडी बनते जा रहे हैं।
यह स्थिति लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक संकेत है। जब नागरिक को पुलिस से डर लगने लगे, तो समझ लीजिए कि कानून व्यवस्था की जड़ें कमजोर हो चुकी हैं।
MP NEWS: पुलिस का कर्तव्य केवल अपराध रोकना ही नहीं, बल्कि जनता का विश्वास जीतना भी है। लेकिन मध्यप्रदेश में यह विश्वास हर दिन टूटता हुआ नजर आ रहा है। वर्दी, जो कभी सुरक्षा और भरोसे की पहचान थी, आज कई मामलों में डर, दबाव और दमन का प्रतीक बनती जा रही है।
सवाल सीधा है , क्या मध्यप्रदेश की पुलिस कानून की रखवाली कर रही है या सत्ता और रसूखदारों के इशारों पर काम कर रही है?
यह सवाल भी उतना ही अहम है कि पुलिस इतनी बेलगाम कैसे हो गई?
क्या यह प्रशिक्षण की कमी है, या फिर ऊपर से मिलने वाला राजनीतिक संरक्षण?
क्योंकि जब पुलिस को यह भरोसा हो जाता है कि उसके गलत कदमों पर कोई कार्रवाई नहीं होगी, तब कानून का राज खत्म होकर वर्दी का राज शुरू हो जाता है।
सरकार सुशासन और संवेदनशील प्रशासन के बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन जमीनी सच्चाई इन दावों की पोल खोलती नजर आ रही है।
अगर पुलिस ही जनता की आवाज़ दबाने लगे, तो लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कैसे सुरक्षित रहेगा?
क्या सत्ता यह मानने को तैयार है कि पुलिस सुधार अब सिर्फ एक विकल्प नहीं, बल्कि एक आवश्यकता बन चुका है?
आज मध्यप्रदेश की जनता गुस्से में है, सवाल पूछ रही है और जवाब चाहती है। यह सवाल केवल कुछ घटनाओं का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम का है।
अगर अब भी पुलिस की कार्यशैली पर सख्त और पारदर्शी कार्रवाई नहीं हुई, तो जनता का भरोसा पूरी तरह टूट जाएगा।
और याद रखिए—
जब जनता का भरोसा टूटता है, तो केवल सरकार नहीं, पूरा प्रशासनिक ढांचा सवालों के घेरे में आ जाता है।
अब वक्त है कि जिम्मेदारों की जवाबदेही तय हो, दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की जाए और यह संदेश साफ-साफ जाए कि—
वर्दी कानून से ऊपर नहीं, बल्कि कानून की रक्षक है।
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रिपोर्ट – विजय गौतम
