Hindustan24

Human-Elephant Conflict : पेड़ों पर शरण, जमीन पर खौफ — हाथियों का कहर जारी, पेड़ो की शाखाओं में रहने को मजबूर हुए लोग

Human-Elephant Conflict

Human-Elephant Conflict

Spread the love

Human-Elephant Conflict : अनूपपुर: 21वीं सदी में जहां देश चांद तक पहुंचने की बातें कर रहा है, वहीं हमारे ही देश के कुछ ग्रामीण आज भी आदिमानव जैसा जीवन जीने को मजबूर हैं। वजह है जंगली हाथियों का जानलेवा आतंक।

इंसान बनाम हाथी: अनूपपुर में संघर्ष चरम पर:

अनूपपुर जिले से सटे ग्रामीण इलाकों की सच्चाई हैं। जैसे ही सूरज ढलता है, पूरे क्षेत्र में दहशत का साया गहराने लगता है। यह समस्या किसी एक गांव तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे इलाके में इंसान और जंगली जानवरों के बीच संघर्ष चरम पर पहुंच चुका है।

हाथियों के झुंड ने ग्रामीण क्षेत्रों में जमकर उत्पात मचाया है। कई घर ताश के पत्तों की तरह ढह गए हैं, तो खेतों में खड़ी फसलें पूरी तरह तहस-नहस कर दी गई हैं। हालात इतने भयावह हैं कि जान बचाने के लिए ग्रामीणों को पेड़ों की ऊंची शाखाओं पर लकड़ी और बांस के सहारे अस्थायी ठिकाने बनाने पड़े हैं। लोग खुले आसमान के नीचे, हर पल मौत के साए में रात गुजारने को मजबूर हैं।

MP Atithi Vidwan latest news : मध्य प्रदेश में अतिथि विद्वानों को नए साल में बड़ा तोहफा, लागू होगा हरियाणा मॉडल! बदल जाएंगे ये नियम

सुरक्षा के वादे धरे रह गए, प्रशासनिक विफलता पर भड़के ग्रामीण

स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रशासन की ओर से अब तक कोई ठोस और स्थायी इंतजाम नहीं किए गए हैं। वहीं वन विभाग का दावा है कि हाथियों को जंगल की ओर खदेड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं और ग्रामीणों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने की योजना पर भी काम हो रहा है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि ग्रामीणों का डर कम नहीं हुआ है और पेड़ों पर रात बिताने की मजबूरी एक गंभीर प्रशासनिक विफलता की ओर इशारा कर रही है।

New Year Liquor Party license : नए साल में घर पर शराब पार्टी के लिए लाइसेंस अनिवार्य, ऑनलाइन करना होगा आवेदन, ये है पूरी प्रोसेस

डिजिटल इंडिया के दावों के बीच, सुरक्षा से महरूम ग्रामीण

अब सवाल यह है कि आखिर कब तक ये लोग परिंदों की तरह पेड़ों पर रातें गुजारते रहेंगे? विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक तंत्र आखिर किसके लिए काम कर रहा है? सरकार डिजिटल इंडिया और विकास के बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन क्या इस विकास की परिभाषा में इन ग्रामीणों की सुरक्षा शामिल नहीं है?वन्यजीव संरक्षण जरूरी है, लेकिन क्या इंसानी जान की कीमत पर? हाथी जंगली हैं, उन्हें कानून का ज्ञान नहीं, लेकिन क्या प्रशासन भी बेखबर है? सत्ता के गलियारों में बैठे जिम्मेदार लोग शायद यह भूल चुके हैं कि अगर इन ग्रामीणों के सब्र का बांध टूटा, तो उसकी गूंज विधानसभा की चौखट तक जरूर पहुंचेगी।

 

रिपोर्ट – विजय गौतम

Exit mobile version